जो भाव सुने नहीं जाते, वे शरीर पर बोझ बन जाते हैं

हममें से ज़्यादातर लोग
इमोशंस से निपटने का एक ही तरीका जानते हैं—

  • “अभी समय नहीं है”

  • “इसे बाद में देखेंगे”

  • “इतनी सी बात पर क्या फील करना”

ऊपर से हम ठीक चलते रहते हैं।
लेकिन अंदर कुछ धीरे-धीरे भारी होने लगता है।

और कुछ समय बाद
शरीर बोलने लगता है।


इमोशंस इग्नोर करने से खत्म नहीं होते

यह एक आम गलतफहमी है कि
जो भाव हम ध्यान नहीं देते,
वे अपने आप चले जाते हैं।

असल में होता यह है—

भाव
दिमाग से हट जाते हैं,
लेकिन शरीर में रुक जाते हैं।

और शरीर
उन्हें संभाल कर रखता है।


यही कारण है कि शरीर बिना कारण थकने लगता है

जब भाव दबे रहते हैं

  • शरीर लगातार अलर्ट मोड में रहता है

  • माँसपेशियाँ ढीली नहीं हो पातीं

  • सांस उथली हो जाती है

ऊपर से आप आराम भी करें,
तो भी शरीर को
पूरा आराम नहीं मिलता।

क्योंकि असली तनाव
बाहर नहीं, अंदर चल रहा होता है।


इग्नोर करना दरअसल एक तरह का दबाव है

जब आप खुद से कहते हैं—
“मुझे ऐसा महसूस नहीं करना चाहिए”

तो आप:

  • भाव को गलत ठहराते हैं

  • उसे जगह नहीं देते

यह अंदर एक खिंचाव बनाता है।

और यह खिंचाव
धीरे-धीरे
शरीर पर बोझ बन जाता है।


यही बोझ बाद में अलग-अलग रूप लेता है
  • लगातार थकान

  • भारी सिर

  • सीने या पेट में अजीब सा दबाव

  • बिना वजह चिड़चिड़ापन

शरीर कुछ नया नहीं कर रहा।
वह सिर्फ यह दिखा रहा है
कि अंदर बहुत कुछ रुका हुआ है।


इसका मतलब यह नहीं कि आपको सब फील करना चाहिए

यह ब्लॉग
आपसे यह नहीं कह रहा कि
हर भावना में डूब जाएँ।

बस इतना कह रहा है—

भावों को
नकारने की बजाय
नोटिस करना शुरू करें।

क्योंकि जो भाव
देख लिए जाते हैं,
वे शरीर पर बोझ नहीं बनते।


आज के लिए बस एक छोटा प्रयोग

आज जब कोई भावना आए—

उसे बदलने की कोशिश मत कीजिए।
उसे सही-गलत मत ठहराइए।

बस पूछिए—

“यह भाव शरीर में कहाँ महसूस हो रहा है?”

यहीं से
दबाव ढीला पड़ना शुरू होता है।


अगले ब्लॉग में हम समझेंगे—

“पूरा आराम करने के बाद भी
आप थके हुए क्यों महसूस करते हैं?”

अगर यह पढ़ते हुए
आपको अपने शरीर की थकान
थोड़ी समझ में आने लगी—
तो यह संयोग नहीं है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This field is required.

This field is required.